आज की सुबह रवि की हल्की लालिमा के साथ प्रातः के सर्द भरी सुबह की शीतलता का हरण कर रही थी। 

मैं आज समय से पूर्व प्रातः 5 बजे उठा। आज हमारे महाविद्यालय में हमारे हिंदी विभाग के प्रथम व अंतिम वर्ष के सभी विधार्थी शैक्षणिक भ्रमण के लिए कबीरधाम जाने वाले थे। इसी कारण शायद आने वाले दिन व वहाँ के सुंदर दृश्य की कल्पना से मन अधीर हो उठा था। और उसे देखने की जिज्ञासा भी थी। सुबह 6.30 बजे मैं अपने महाविद्यालय परिसर पहुँचा। मेरे कुछ मित्र वहाँ पहले से उपस्थित थे। सभी अपने अपने साथ दिन का भोजन व पीने के लिए पानी रखे थे। निकलने से पूर्व हम सभी विद्यार्थी और शिक्षकों ने एक सामूहिक फोटो खिंचवाया। तत्पश्चात सुबह 8 बजे हमारी बस महाविद्यालय परिसर से अपने गंतव्य स्थान हेतु निकल पड़ी। सभी के होंठो पे मुस्कान व हर्ष का भाव दिखाई दे रहा था। 

मैं बस में सामने की सीट पर बैठा था। जहाँ से सड़कों में चल रहे वाहन व रास्ते में पड़ रहे गाँवो का सुंदर दृश्य का मैं आनंद ले रहा था। हमारी बस सुबह 9 बजकर 5 मिनट पर संगीत नगरी खैरागढ़ पहुँची जो कि आमनेर नदी के किनारे बसा है। इस नगर की अपनी गौरवशाली अतीत है। यहाँ संगीत विश्वविद्यालय स्थित है जिसे एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय होने का गौरव प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना खैरागढ़ रियासत के 24वें राजा विरेंद्र बहादुर सिंह तथा रानी पद्मावती देवी द्वारा सन् 1956 में अपनी बेटी राजकुमारी ' इन्दिरा' के नाम पर की गयी थी। इस विश्वविद्यालय में देश विदेश के विभिन्न संगीत व कला के विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। हम सुबह संगीत विश्वविद्यालय देखने गए परंतु समय से पूर्व चले जाने के कारण वहाँ के विभिन्न विभागों में हमें प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। 

तत्पश्चात हमारी बस अपने अगले गंतव्य स्थान की ओर जाने लगी। 

सुबह 11.24 बजे हम कबीरधाम पहुंचे। इसे धर्म नगरी के रूप में जाना जाता है। इस क्षेत्र में सड़कों के दोनों किनारों पर दूर दूर तक सिर्फ गन्ने की फसल दिखाई पड़ रही थी। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। बोडला तहसील से 1 km आगे आने पर हमें ऊँचे ऊँचे मैकल श्रेणी के पहाड़ दिखाई देने लगे। जो ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों सीना तान कर खड़े हो हमारी स्वागत कर रहे हो।चिल्फी घाटी की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक -30 ( जबलपुर- कवर्धा) को छोड़ हमारी बस रानी दरहा गाँव की ओर मुड़ी। इस गाँव की ओर जाने वाला यह मार्ग कच्चे रास्तों व ऊँचे ऊँचे विशाल सघन वृक्षों से ढंके हुए थे। इस मार्ग में कच्चे व तंग संकरे रास्तों पर आगे बढ़ने पर हमें 2-3 छोटे छोटे गाँव दिखे। जहां के लगभग सभी मकान कच्चे थे। कुछ आदिवासी लोग भी अपने अपने कार्यो में व्यस्त दिखाई दिये। बैगा आदिवासी बहुल यह क्षेत्र सुदूर घने वनों में बसा है। यहाँ के इन तंग गाँवो को देख ऐसा लग रहा है जैसे विकास की रफ्तार भी इन गाँवों तक आते आते धीमी पड़ गयी हो। केंद्र सरकार ने इन बैगा आदिवासियों को विशेष पिछड़ी जनजाति के रूप में शामिल किया है। जिनके संरक्षण और विकास का प्रयास सरकार द्वारा किया जा रहा है। लेकिन यहाँ के इन दृश्यों को देख यह सब कागजी दावे लगते है। 

इन सभी रास्तों को पार करते हुए हम अपने गंतव्य स्थान रानी दरहा जल प्रपात तक पहुँच गए। बस से उतरकर सभी विद्यार्थी अपने अपने समूहों के साथ जलप्रपात की ओर निकल पड़े। मैं भी अपने मित्र समूह के साथ आगे बढ़ चला। यहाँ के ऊँचे ऊँचे पहाड़ों को देख मन सहज ही रोमांचित हो रहा था। ये मैकल श्रेणी के पहाड़ घने वनों से आच्छादित थे। सभी लोग इस प्राकृतिक वातावरण की सुंदरता की छवि को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे। मैं इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता से मंत्रमुग्ध था। ऊँचाई से गिरता जलप्रपात सहज ही किसी का भी मन मोह ले। यह एक प्रमुख पर्यटन क्षेत्र है। हमारे अलावा और बहुत से पर्यटक यहाँ भ्रमण करने आये हुए थे। इस स्थान पर 30-40 मिनट व्यतीत करने के बाद हम वापस निकल पड़े भोरमदेव की ओर। 

अब हमारा अगला गंतव्य स्थान भोरमदेव मंदिर था। 

कबीरधाम जिले से 18 कि. मी. की दूरी पर चौरागाव में मैकल पर्वत श्रेणी की गोद में बसा है यह भोरामदेव मंदिर। इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपालदेव ने करवाया था। यह मंदिर नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। संभवतः इसी कारणवश इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। 

यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। राजा गोपालदेव भी शैव धर्म के उपासक थे संभवतः इसी वजह से इस मंदिर का निर्माण शिव मंदिर के रूप में किया गया होगा। 

यहाँ पहुंचकर हम सभी ने साथ बैठकर दोपहर का भोजन किया। तत्पश्चात हमारे विभागाध्यक्ष डॉ. शंकर मुनि राय सर ने सभी विद्यार्थियों से उनका परिचय जाना। फिर सर के नेतृत्व में हम सभी लोग स्वर से स्वर मिलाकर जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित कविता ' हिमाद्रि तृङ्ग शृंग से ' गाये। यह कविता मुझे बहुत पसंद आयी। इस कविता को सुन ह्रदय में एक नए जोश की अनुभूति हो रही थी। 

इसके बाद हम दर्शन के लिए भोरमदेव मंदिर गए। 

मंदिर के बाहर नारियल, फूल प्रसाद के छोटे छोटे ठेले लगाए बहुत से स्त्री- पुरुष अपने दुकान से सामान खरीदने का बार बार आग्रह कर रहे थे। उन सब में कुछ 7-8 वर्ष के बच्चे भी थे जो उनके साथ एक आशा भरी नजरों से यही स्वर दोहरा रहे थे। 

इनमें से कुछ बच्चे घुटनों तक वाली हाॅफ पैंट और बदन पर मैली सी बनियान पहने हुए थे। इस दृश्य ने मुझे अतीत की एक घटना याद दिला दी, कि कैसे मेरे बैगा आदिवासी मित्र भारत लाल बैगा जो कि इसी क्षेत्र का रहने वाला है, उसने अपनी कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करके IIT की परीक्षा पास की थी। और अपने बैगा समाज के लिए एक अद्भुत मिसाल पेश की थी। 

इन बच्चों को देख कर मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे। इतनी छोटी उम्र में जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए उन हाथों में गरीबी व घर की जिम्मेदारी की बोझ दिखाई दे रही थी। 

हमारे देश में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी यही दर्शाती है की पिछले दो सालों में बाल श्रमिकों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट को खारिज करने वाले देश में आज खाने की लालसा लिए एक वृद्ध महिला हमारे पास आकर भोजन देने की आग्रह कर रही थी। हमने अपना बचा हुआ सारा भोजन उसे दे दिया, वह खुशी से हमें धन्यवाद देते हुए चली गई। 



मंदिर में अंदर जाने पर यहाँ की सुंदर नक्काशी देख मन आश्चर्यचकित रह गया। पत्थरों पर बहुत ही बारीकी से अत्यंत आकर्षक व सुंदर चित्र उकेरे गए थे। 

समय अपनी चाल से आगे बढ़ रही थी। हम अपनी बस में बैठ वापस आने के लिए वहाँ से निकल पड़े। 

बस में कुछ मध्यम ध्वनि में संगीतों की मनमोहक धुन पर हम सभी थिरकने लगे और सफर का आनंद लेने लगे। 

हमारी बस शाम 7.30 बजे वापस महाविद्यालय परिसर पहुंची और सभी लोग बस से उतरकर अपने- अपने घरों की ओर जाने लगे। मैं भी आज की अनगिनत यादों व कभी न आने वाले लम्हों को साथ लिए अपने कमरे की और लौट चला


 लेखक - तुलेश्वर कुमार यादव

         एम. ए. पूर्व ( हिंदी साहित्य) 

शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव