आप सभी का हमारे वेबसाईट में स्वागत है। आज हम आपको अज्ञेय जी द्वारा रचित कविता " नदी के द्वीप" की व्याख्या उपलब्ध कराने जा रहे हैं। यह कविता एक व्यक्ति प्रधान रचना है। इसमें कवि कहता है कि हम समाज के भाग हैं , जिस प्रकार नदी जो है वो द्वीप ( चारों ओर पानी से घिरा क्षेत्र) को अपने पुत्र के समान अपनी गोद में बैठाए हुए है , नदी द्वीप को विशाल जमीन से मिलाती है । उसी प्रकार व्यक्ति समाज का पुत्र है, वह समाज की गोद में बैठा है । समाज व्यक्ति को परंपराओं से मिलाता है और वह परंपराए व्यक्ति को सभ्य बनाती हैं।

आज हम इस कविता की व्याख्या करने जा रहे हैं। जो प्रयोगवादी युग की एक प्रमुख रचना मानी जाती है।