दोस्तों अब कहानी को आगे लेकर चलते हैं। कमलेश दिल्ली जाने के लिए तैयार है और घर में सभी तैयारियां कर ली गई है। बेटे के pdhai के प्रति गंभीरता से रमेश बाबू रोमांचित हैं

अब आगे 

संतोष ने घर में जैसे तैसे जल्दी से खाना खाया। और अपने बरामदे पर रखे वुडलैंड के जूते पहनने लगा  जिसे BA पास करने के अभी दो महीने पहले ही लिया था। रमेश बाबू अपनी होंडा पोंछ के सामने मोबाइल पर बतिया रहे थे।

मां तभी दही चीनी की कटोरी लेकर बाहर निकली , लो थोड़ा दही खा लो , दही चीनी से जतरा बनता है।  " सामान्य तौर पर इस देश में दही से दही बड़ा, लस्सी, रायता के अलावा जतरा भी बनता है। यह दुनिया में और कहीं नहीं बनता। जतरा बनने का अर्थ है यात्रा शुभ होना।

गांव कटिहार से छपरा रेलवे स्टेशन लगभग 50 किलोमीटर पड़ता था। सड़क ऐसी की दो तीन घंटे तो लग ही जाते पहुंचने में। ।

कमलेश मां के पैर छुए, पीठ पर बैग लटकाया और बाइक पर रमेश बाबू के पीछे बैठ गया। मां दो कदम आगे आकर बोली "देखो बेटा उदास मत होना , खूब मन लगाकर पढ़ना । खर्चा का भी मत सोचना सब भेजेंगे पापा। तुम बस जल्दी से खुश खबरी देना।" कहते हुए मां का गला भर आया था और इन आंखो से आंसुओ की धार फुट पड़ी जो मां ने घंटो से रोक रखा था और इन आंसुओ में भी एक खुशी थी। एक उम्मीद थी। आखिर बेटे के भविष्य का सवाल था। कलेजे पर पत्थर रखना ही था। इसमें दर्द तो था पर ये बेटे की भविष्य की नीव में डाला गया पत्थर था। वह फूल का पत्थर था।

रमेश बाबू बाइक स्टार्ट कर चुके थे।

बाइक घर से धूल उड़ाते हुए निकाल पड़ी। रास्ते में रमेश बाबू कुछ दूर जाने पर बाइक की स्पीड कम करके कमलेश से पूछा " एटीएम रख लिए हो ?" 

कमलेश ने जेब को हाथ से देखते हुए हा कहा ।

स्टेशन पहुंचते सवा दस बज चुके थे। बार बार हो रही उद्घोषणा से पता चल रहा था कि ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी है। साढ़े दस में ट्रेन के खुलने का समय था। बाइक से झट उतर कमलेश ने समान बंधे रस्सी को खोला। रमेश बाबू झोला लेकर आगे बढ़े , तबतक लगभग ऊंचे स्वर में कमलेश ने कहा  , पापा प्लेटफॉर्म टिकट ले लीजिए" । पहले तो रमेश बाबू अनसुने ढंग से आगे बढ़े फिर एक क्षण रुककर प्लेटफॉर्म टिकट काउंटर की तरफ चले गए। अपने बेटे के अंदर एक सजग और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के गुण देख कर वे मन ही मन प्रसन्न थे और बस इसी की लाज रखने प्लेटफॉर्म टिकट की लाइन में खड़े हो गए थे। नहीं तो यह पहली ही बार था जब छपरा रेलवे स्टेशन के अंदर जाने के लिए वे प्लेटफॉर्म टिकट ले रहे थे। वह तो घर का स्टेशन था। हमेशा का आना जाना था। यहां टिकट लेकर वे खुद की नजर में कतई गिरना नहीं चाहते थे।

प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर विक्रमशिला खड़ी थी। दोनों प्लेटफॉर्म पर पहुंच गए। कमलेश ने जेब से टिकट निकला और बोला एस 3 में है मिडिल बर्थ दिया है।   " सिविल की तैयारी करने वाले लड़के को जब भी कोई पिता स्टेशन छोड़ने जाता है तो मानिए वह पी एस एल वी छोड़ने गया हो। खुशी, उत्साह, डर, संदेह सब तरह के भाव चेहरे पर एक साथ दिखते थे। 

रमेश बाबू तुरंत हरकत में आ गए , झट पट चलते हुए एस 3 बोगी तक पहुंच गए। बोगी में चढ़े और सीट के नीचे जाकर झोला सरका दिया। तब तक पीछे कमलेश भी बैग लटकाए आ गया। रमेश बाबू ने कहा , चलो सामान एडजस्ट हो गया है अब आराम से जाना। 

बिना किसी के लाग लपेट में पड़े एकदम लक्ष्य बनाके पढ़ो। कामभर जितना खर्चा हो, निकाल लेना। एटी एम तुमको दे दिए हैं। पूरा समाज का नजर है। सबको दिखाना है कुछ करके। हम पैसा देने में कमी नहीं करेंगे, तुम्हारा काम मेहनत है, इसमें कमी नहीं करना ।" असल में एक सिविल अभ्यर्थी बेटे और पिता के बीच रिश्ते का आधार इन्हीं दो परम सत्य के आस पास मंडराता है। बेटे को खर्च चाहिए और पिता को परिणाम।

ट्रेन खुलने का समय हो गया। कमलेश ने पिता के पाव छुए । 

ट्रेन की सिटी बजी। रेलगाड़ी धीरे धीरे प्लेटफॉर्म से सरकने लगी। रमेश बाबू बाहर आ बाइक स स्टार्ट कर निकल गए।




इस कहानी का भाग 3 जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।

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