बस्तर छत्तीसगढ़ का एक ऐसा स्थान जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। बस्तर का नाम सुनते ही हमारे सामने ऊंचे ऊंचे पहाड़, जलप्रपात, घने जंगल व नक्सलवाद का चित्र उभरने लगता है। यहां की खूबसूरत वादियों के बारे में मैं अभी तक सिर्फ किताबों में या समाचार पत्रों में या किसी अन्य लोगों से सुनता आया हूं। मैं एक बार बस्तर जाकर वहां की खूबसूरती को महसूस करना चाहता था। इस वर्ष मेरा यहां जाने का सपना पूरा होने वाला था। 


हमारे महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा इस वर्ष शैक्षणिक भ्रमण में जाने हेतु बस्तर का चयन किया गया था लेकिन किन्ही कारणों से यहां की यात्रा को रद्द कर सिरपुर जाने का निर्णय लिया गया। लेकिन मेरा मन तो पहले ही बस्तर की सैर पर निकल गया था। वहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखने की आतुरता मेरे मन में थी, और यह महाविद्यालय में अंतिम वर्ष भी था, इसके बाद पुनः इस प्रकार एक साथ कहीं जा पाना भी संभव नहीं था। इसलिए हम लोगों ने अलग से बस्तर की यात्रा पर जाने का निर्णय लिया। 


24 फरवरी की रात्रि 10 बजे हम लोग बस्तर की यात्रा पर निकल गए। रात भर सफर करने के बाद सुबह के करीब 4 बजे हम लोग बस्तर पहुंच गए। गाड़ी में मस्ती करते करते सुबह कैसे हो गई यह भी पता नहीं चला ऐसा लग रहा था जैसे अभी अभी ही गाड़ी में बैठे हैं और बहुत जल्द ही पहुंच गए हैं।
बस्तर पहुंचकर हम लोग मेरे एक भैया जो वहां शिक्षक हैं, उनके घर पर रुके। वहां पहुंचकर कुछ लोग सो गए और कुछ लोग आसपास घूमने चले गए। मैं भी अपने भैया के साथ वहीं  सड़क के पास बनी पुलिस चौकी पर जाकर अलाव के पास बैठा था। यह सड़क छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश की ओर जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 थी। आज एक बार फिर भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था की तस्वीर मेरे सामने थी। सड़क पर अलग राज्यों से आ रही ट्रकों को रोककर उनसे गलत तरीके से बॉर्डर पास शुल्क लिया जा रहा था। पूछने पर पता चला कि यह सब बड़े अधिकारियों के सहयोग से किया जा रहा है।


आज बस्तर में हमारा पहला भ्रमण स्थल चित्रकूट जलप्रपात था सुबह के लगभग 10 बजे हम लोग चित्रकूट जलप्रपात पहुंच चुके थे। जैसा इस जलप्रपात के बारे में मैंने सुना था, उससे कहीं अधिक खूबसूरत था यह। चट्टानों के ऊपर से गिरता यह जलप्रपात सहज ही हर किसी को आकर्षित कर रहा था। इसकी विशाल चौड़ाई व भारी जलराशि के कारण इसे छत्तीसगढ़ का नियाग्रा भी कहा जाता है। इस स्थान की सुंदरता को कैमरे में कैद करते-करते जलप्रपात के नीचे मुझे कुछ आदिवासी महिलाएं दिखी जो वहां पर सल्फी बेच रही थी। सल्फी एक प्रकार का पेय पदार्थ है,जिसे आदिवासी लोग किसी विशेष अवसरों पर पीते हैं। चित्रकूट में घूमते-घूमते मुझे एक चीज जगह-जगह नजर आ रही थी वह थी मंदिर। लोगों ने उस स्थान पर हर 20 मीटर की दूरी पर छोटे-छोटे मंदिर बना रखे थे। इन मंदिरों का उद्देश्य मेरे ख्याल से सिर्फ एक ही था पर्यटकों से चढ़ावा। विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल होने की लगभग  सारी संभावनाओं को यह समाप्त करता नजर आ रहा था। 2 घंटे घूम लेने के पश्चात हम लोग अपने अगले गंतव्य स्थल के लिए निकल पड़े। 


बस्तर की सड़कों से गुजरते हुए वहां के जनजीवन को मैं गाड़ी में बैठे - बैठे देख रहा था। सड़क के दोनों किनारों पर पत्थरों से घर बने हुए थे, जिनकी छत भी सिर्फ पत्थरों से बनी हुई थी। इस प्रकार के घर में पहली बार देख रहा था।
लगभग दोपहर के 3 बजे हम लोग कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में पहुंच गए। इस राष्ट्रीय उद्यान की प्रमुख विशेषता कुटुमसर गुफा है, जो कि विश्व में चूने पत्थरों से बनी चट्टानों के लिए जानी जाती है। इस गुफा में पर्यटकों को अकेले जाने की इजाजत नहीं है इसलिए हमें साथ में गाइड ले जाना पड़ा। गुफा के अंदर घना अंधेरा था। बिना टॉर्च के गुफा में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। टॉर्च की रोशनी में गुफा की दीवारों में चूने के पत्थरों से बनी हुई विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां दिखाई दे रही थी। गुफा के अंदर हमें अंधी मछली भी दिखाई दी, जिसे इसके खोजकर्ता शंकर शेष जी के नाम पर शेष मछली भी कहा जाता है। इस राष्ट्रीय उद्यान में हमें कुछ गांव भी दिखाई दिए जो संभवत आदिवासियों के ही होंगे। इन आदिवासी गांवों के युवा राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटकों को घुमाने के लिए गाइड के रूप में कार्य करते हैं।


राष्ट्रीय उद्यान से निकलकर हम लोग तीरथगढ़ जलप्रपात की ओर जाने लगे। यहां भी ऊंचाई से गिरता हुआ जलप्रपात था जो बहुत सुंदर दिखाई दे रहा था। लगभग शाम के 6 बजे हम लोग यहां से दंतेवाड़ा के लिए निकल पड़े। 


दंतेवाड़ा शहर डंकिनी शंखिनी नदी के किनारे पर बसा हुआ है, जो कि दंतेश्वरी देवी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। अगले दिन सुबह हम लोग ढोलकल गणेश मंदिर जाने के लिए निकल गए। यह मंदिर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बैलाडीला के ऊंचे पहाड़ों पर स्थित है। सुबह लगभग 8 बजे हम लोग यहां पहुंच चुके थे। ढोलकल गणेश मंदिर तक पहुंचने के लिए पैदल लगभग 8 किलोमीटर की यात्रा करके जाना पड़ता है और वह भी एक गाइड के साथ। लेकिन हमें इसकी जानकारी पहले नहीं थी। हम लोग पहाड़ के ऊपर स्थित मंदिर तक जाने के लिए पैदल ही बिना गाइड के निकल गए। प्रारंभ में ही हम लोग गलत रास्ते पर चले गए और काफी दूर जाने के बाद भी जब आगे  कुछ समझ नहीं आया तो मेरे अधिकांश साथी वापस जाने लगे। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था की पहाड़ की चोटी से हम लोग ज्यादा दूर नहीं हैं। तो मैं, निकिता और हिमांशु के साथ पहाड़ की चोटी पर जाने के लिए आगे बढ़ने लगा और बाकी सभी लोग परेशान होकर वापस नीचे जाने लगे। हम लोग काफी देर से चले जा रहे थे, लेकिन जंगल इतना घना था, कि बड़ी मुश्किल से पहाड़ की चोटी तक पहुंचे। हम लोग गलत पहाड़ की चोटी पर खड़े थे। अब चुनौती थी वापस नीचे जाने की क्योंकि नीचे जाने के लिए अब हमें रास्ता ही नजर नहीं आ रहा था। हम लोग घने जंगलों के बीच में फंस गए थे। चारों ओर ऊंचे ऊंचे पहाड़ और घना जंगल था। जंगल के बीच में हमें यह भी समझ नहीं आ रहा था कि हम  लोगों को किस दिशा में आगे जाना है। जिस भी दिशा में आगे बढ़ रहे थे कुछ दूर आगे जाने के बाद वहां घनी झाड़ियों से रास्ता बंद नजर आता था। हम तीनों लोग हताश और निराश हो चुके थे। लगभग 2 घंटे से हम लोग घने जंगल में फंसे हुए थे। घने जंगल में एक अच्छी बात यह थी कि हमारे मोबाइल में नेटवर्क था  और इंटरनेट कनेक्शन भी। मोबाइल में जीपीएस और चुंबकीय सुई की सहायता से उसी के भरोसे हम लोग आगे बढ़ते रहे और अंत में घने जंगल से बाहर आने में सफल रहे। आज का यह दिन जिंदगी का सबसे यादगार दिन बन गया था। वहां के स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि इस जंगल में आने वाले बहुत से पर्यटक रास्ता भूल कर जंगल में भटक जाते हैं।
यह स्थल पर्यटकों के आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र है, फिर भी स्थानीय प्रशासन द्वारा पर्यटकों के लिए कोई भी सुविधा वहां उपलब्ध नहीं है, यहां तक की किस रास्ते पर जाना है यह भी स्पष्ट रूप से वहां दर्शाया नहीं गया है। 


ढोलकल गणेश से निकलकर हम लोग दंतेश्वरी मंदिर चले गए। यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ थी। यहां से निकलकर फिर हम लोग वापस आने के लिए निकल पड़े। बस्तर में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। सरकार को इन पर्यटन स्थलों को विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि यहां पर पर्यटकों को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
बस्तर में विकास तो हुआ है, लेकिन अभी भी काफी कुछ किया जाना शेष है। बस्तर आकर मुझे इसकी प्राकृतिक सुंदरता को नजदीक से महसूस करने का मौका जरूर मिला,जो कि मेरे लिए हमेशा एक अविस्मरणीय पल रहेगा। लेकिन 2 दिन के इस अत्यंत अल्प सफर में यहां के जनजीवन, परंपरा, रीति रिवाज को पास से देखने की जो इच्छा मेरे मन में थी वह अभी भी पूरी नहीं हो पाई है। मैं निश्चित ही एक बार फिर बस्तर आऊंगा और यहां की संस्कृति, रीति रिवाज, जनजीवन, परंपरा तथा यहां की अप्रतिम सुंदरता को अत्यंत समीप से महसूस करूँगा।


तुलेश्वर् कुमार यादव