मैं भी इस यात्रा का हिस्सा बनने के लिए अपने घर से सुबह ही निकल गया था शाम को महाविद्यालय से हमारी बस हमारे पहले गंतव्य स्थल- भेड़ाघाट के लिए रवाना हुई। रात भर के सफर के बाद हम लोग सुबह 6 बजे जबलपुर जिले के भेड़ाघाट कस्बे में पहुंचे। सुबह बस से उतरते ही मैं अपने मित्र मंडली के साथ भेड़ाघाट के विश्व विख्यात जलप्रपात की ओर चल पड़ा। जब हम लोग जलप्रपात के पास पहुंचे और जो दृश्य देखा उसे देखकर मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला - अद्भुत । वहां के सुंदर एवं अद्भुत नजारों को शब्दों में बयां कर पाना उतना ही मुश्किल है जितना गहनों से सजी किसी नवविवाहिता की सुंदरता को। पूरा जलप्रपात ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जलप्रपात को किसी ने कोहरे की चादर से लपेट लिया है और शायद इसीलिए इसका नाम धुआंधार रखा गया है। विशाल जलराशि अपनी तेज एवं डरा देने वाली आवाज के साथ नीचे की ओर गिर रही थी और उसकी ठंडी - ठंडी बूँदे वायु के साथ गालों को स्पर्श कर रही थी।
अमरकंटक से निकलकर नर्मदा नदी भेड़ाघाट में यह जलप्रपात बनाती है और फिर अपनी भ्रंश घाटी में बहते हुए अरब सागर में जाकर मिल जाती है, तापी एवं नर्मदा नदी ही दो एकमात्र ऐसी नदियां हैं जो भ्रंश घाटी में बहती हुई अरब सागर में मिल जाती है।
प्लेट टेक्टोनिक सिद्धांत के अनुसार भ्रंश घाटी का निर्माण तब होता है जब दो प्लेट एक दूसरे से दूर जाती है। सर्दी के इस मौसम में धुआंधार जलप्रपात के पास सुबह का तापमान लगभग 4- 5 डिग्री सेल्सियस था और बिल्कुल जमा देने वाली ठंड थी। रिफ्ट वैली के टॉप से नीचे की ओर बहती नर्मदा नदी को जी भर निहार कर और उन अविस्मरणीय पलों को कैमरों में कैद कर हम लोग वापस अपने बस के पास चले गए।
सुबह तैयार होकर हम लोग भेड़ाघाट के अन्य पर्यटन स्थलों को देखने निकल पड़े। ऐसा ही एक स्थान था नौका विहार का। सभी नाव में सवार होकर रिफ्ट वैली में बहती हुई नर्मदा नदी तथा उसके दोनों ओर ऊंचे - ऊंचे संगमरमर के दूधिया चट्टानों को देखने के लिए चल दिए। इन चट्टानों को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित था कि इतना सुंदर कोई स्थान कैसे हो सकता है। नर्मदा नदी 30 मीटर गहरे और 8 कि. मी.लंबे गॉर्ज में गिरकर यह अद्भुत दृश्य बनाती हुई इन संगमरमर के चट्टानों के बीच से बहती है। इसे भारत की ग्रैंड कैनयन भी कहा जाता है।( विश्व प्रसिद्ध ग्रैंड कैनयन की घाटी अमेरिका मे कोलोराडो नदी बनाती है)
यहां 64 योगिनी मंदिर भी है जो एक पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर भी अपनी सुंदर मंदिर वास्तुकला के लिए सुप्रसिद्ध है । इस मंदिर के चारों ओर 64 योगिनीयो की मूर्तियां है जो लगभग आठवीं शताब्दी की है। आजाद भारत की संसद भवन इसी मंदिर के तर्ज पर बनाया गया था।
पूरा दिन घूम लेने के बाद हम लोग रात्रि का भोजन करके अपने अगले गंतव्य स्थल पंचमढ़ी के लिए निकल पड़े।
पंचमढ़ी एक प्रसिद्ध पहाड़ी पर्यटन स्थल है जो सतपुड़ा पर्वत श्रेणी की गोद में बसा हुआ है। सतपुड़ा पर्वत श्रेणी एक ब्लॉक पर्वत है जिसका निर्माण प्री कैंब्रियन काल में हुआ है, और आर्यन चट्टानों से बनी है। इस पर्वत श्रेणी में राजपीपला, गाविंलगढ़ , महादेव , मैकल आदि कुछ प्रमुख पर्वत श्रेणियां है। सतपुड़ा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ है जो कि महादेव श्रेणी में स्थित है।
सुबह-सुबह हम लोग पंचमढ़ी पहुंचे और तैयार होकर यहां की सैर के लिए निकल पड़े। चूंकि यह एक छावनी क्षेत्र एवं आरक्षित वन क्षेत्र है इसलिए हमें यहां घूमने के लिए जिप्सी किराये पर लेनी पड़ी। सतपुड़ा के ऊंचे ऊंचे पहाड़, घने जंगल एवं गहरी घाटियां अत्यंत सुंदर एवं मनमोहक थी। ऊंचे पहाड़ों एवं संकरे रास्तों को देखकर कभी मन में डर तो कभी मन रोमांचित हो जाता था। सतपुड़ा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ पर खड़े हो अपनी एक तस्वीर लेना अभी भी बाकी है, क्योंकि किसी कारणवश हम लोग यहां नहीं जा पाए। यहां पर बहुत सारे प्राकृतिक गुफाओं में मंदिर भी बने हुए थे जहां पर लोग भगवान के दर्शन के लिए जाते हैं। इस स्थल पर बहुत सारे एक्टिविटी जैसे हॉट एयर बैलून सफारी, बंजी जंप, जिपलाइन, हॉर्स राइडिंग, बोटिंग इत्यादि भी उपलब्ध है। यहां पर शाम को सनसेट पॉइंट पर डूबते सूर्य को देखना और अलाव के पास सभी के साथ बैठकर एक गायक की सुंदर आवाज के साथ मधुर तरानों पर थिरकना भी कमाल का था। रात को मैं अपने दोस्तों के साथ पैदल पंचमढ़ी के सड़कों पर सैर के लिए गया। यहां की सड़के काफी साफ - सुथरी थी। सड़कों के दोनों किनारों पर हॉटल एवं लॉज की भरमार थी।
अगली सुबह हमारी यात्रा का अंतिम दिन था। सुबह सभी लोग तैयार होकर बस में बैठकर निकल गए अंतिम पड़ाव की ओर। बस रुकी सतधारा जलप्रपात के पास। यह जलप्रपात भी काफी सुंदर था। थोड़ा समय व्यतीत करने के बाद हम लोग यहां से निकल गए।
शाम होते होते हम लोग एक पहाड़ी के ऊपर पहुंच गए जहां से चारों ओर सिर्फ गहरी घाटियाँ और उसके नीचे बसे गांव दिखाई दे रहे थे, जो अत्यंत सुंदर थे। इस स्थान का नाम पातालकोट था। इस अद्भुत दृश्य को देखकर यह नामकरण सार्थक प्रतीत होता है।
इन सभी खूबसूरत नजारों को अपने कैमरों में कैद करके हम सभी वापस बस में बैठ यहां से निकल पड़े।
रात हो गई थी इसलिए एक स्थान पर रुक कर भोजन करने के उपरांत हम सभी लोग वापस आने के लिए निकल पड़े। हमारी बस सुबह लगभग 10 बजे महाविद्यालय परिसर में पहुंची।
चार दिनों की यात्रा के पश्चात सभी लोग वापस अपने घरों की ओर चल दिए, मैं भी इन अनगिनत यादों और कभी न लौटने वाले लम्हों को साथ लिए अपने कमरे की ओर चल पड़ा।
👉 लेखक - तुलेश्वर कुमार यादव
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2 Comments
बहुत खूबसूरत, सभी स्थलों का बड़ी सूक्ष्मता से बिंब व बेहद रोचक शैली में वर्णन 👌👌👌💐💐
ReplyDeleteबेहद ही खूबसूरत शब्दों से प्रकृति की खूबसूरती का वर्णन ।।
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