प्रगतिवाद युग ( 1936 ई. से 1943 ई. तक)-
प्रगतिवाद का मूल आधार सामाजिक समता और राजनैतिक जागृति है। प्रगतिवादी साहित्य में विकासशीलता के बीज तो छिपे ही हैं साथ ही यह घोर विषमता विरोधी है। पूर्ववर्ती काल में शोषितों के प्रति सहानुभति व दया की भावना थी जबकि इस युग में शोषकों के विरूद्ध विद्रोह के स्वर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है- शोषक चाहे अंग्रेज हो या सामंत- जमींदार वस्तुत इस युग में मार्क्स वादी विचारधारा की लहर चल पड़ी थी- जिसमें मनुष्य का स्थान सबसे ऊपर माना गया है। प्रगतिवादी काव्य शोषक के खिलाफ संघर्ष के स्वर को मुखर करता है।
प्रगतिवाद की मुख्य विशेषताएं -
1. प्रगतिवादी काव्य में पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के प्रति घृणा का भाव दृष्टिगोचर होता है।
2. प्रगतिवादी काव्य समतामूलक समाज का पोषक है जिसमें लोग धर्म, जाति, वर्ग, भाषा के भेदभाव से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य समझें।
3. प्रगतिवादी साहित्यकारों ने नारी को पुरुष के समकक्ष माना और वे नारियों को उतने ही अधिकार देने के पक्षधर थे जितने पुरूषों को प्राप्त है।
4. प्रगतिवादी कवियों ने नवीन प्रतीकों को अपनाया। जैसे - कुकुरमुत्ता, मशाल, तांडव आदि।
5. प्रगतिवादी कवियों ने सुन्दर, भव्य, और महानता का चित्रण करने के स्थान पर यथार्थ जीवन का चित्रण किया जिसमें दुःख, परेशानियों एवं कुरूपता हमेशा विद्यमान रहता है।
6. इस युग में सरल और स्वाभाविक भाषा शैली का प्रयोग किया गया।
प्रगतिवाद युग की रचनाकार एवं रचनाएं-
कवि रचनाएं
नागार्जुन युगधारा, तुमने कहा था, प्यासी पथराई आंखे , सतरंगे पंखों वाली
त्रिलोचन धरती, मिट्टी की बारात, मै उस जनपद का कवि हूं
केदारनाथ अग्रवाल युग की गंगा, नींद के बादल, आग का आइना, समय- समय पर, ,अपूर्वा
शिवमंगल सिंह सुमन एशिया जाग उठा, आंखे नहीं भरी विश्वास बढ़ता ही गया, जीवन के गान
प्रयोगवाद युग ( 1943 ई. से 1951 ई. तक )-
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