"उधार " कविता : अज्ञेय
सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी। मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार …
सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी। मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार …
कविता - " बावरा अहेरी " कवि - " अज्ञेय " भोर का बावरा अहेरी पहले बिछाता है आलोक की लाल-लाल कनियाँ पर जब खींचता है जा…
दोस्तों हीरानंद सच्चिदानंद वात्स्यायन ’अज्ञेय’ द्वारा रचित "कविता कलगी बाजरे की " यह कविता मूलतः प्रेम और प्रकृति को अभिव्यक्त करती हैं। अ…
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