प्रत्येक वर्ष 24 जनवरी को देश भर में बालिका शिक्षा
व बालिकाओं के भविष्य को सुनहरा बनाने हेतु सभी को जागरूक करने तथा लड़कियों को उचित मान सम्मान प्राप्त हो इन सभी कारणों से यह दिवस मनाया जाता है।
शुरुवात-
राष्ट्रीय बालिका दिवस को मनाने की शुरुवात सर्वप्रथम 2008 मे किया गया। क्योंकि इस दिन वर्ष 1966 में देश को पहली महिला प्रधानमंत्री मिली थी।
उद्देश्य-
1. बालिका शिशु की भूमिका तथा महत्व के प्रति सभी को जागरूक करना।
2. देश में बाल लिंगानुपात को दूर करने के लिए काम करना।
3. बाल विवाह, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना आदि को लेकर विचार कर सार्थक पहल करना।
4. लड़कियों को उनके अधिकार के प्रति जागरूक करना।
इस दिवस को मनाने की जरूरत हमें इसलिए पड़ी क्योंकि हमारा यह समाज बालिकाओं को कमजोर समझता है उन्हें अभिशाप मानता है।
अब तक की स्थिति-
लड़कियां परिवार की मुस्कान होती हैं। परिवार की शान होती हैं। जहां एक ओर लड़की के जन्म लेने पर मिठाईयां बांटी जाती है, तो वहीं दूसरी ओर हमारी पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में लड़कियां बोझ समझी जाती है।
हमारे समाज में आज भी लड़कियों के परवरिश, शिक्षा, खानपान से लेकर सम्मान, अधिकार, सुरक्षा आदि में बालिका शिशु के साथ भेदभाव किया जाता है. यहां तक की इलाज में भी असमानताएं बरती जाती है।
दहेज प्रथा के कारण कई बार यह देखा गया है कि बालिकाओं को एक दायित्व के रूप में देखा जाता है और उन्हें अक्सर अधीनता हेतु विवश किया जाता है तथा उन्हें शिक्षा या अन्य सुविधाओं के संबंध में दोयम दर्जे की सुविधाएँ दी जाती
- समाज के गरीब तबके प्रायः दहेज में मदद के लिये अपनी बेटियों को काम पर भेजते हैं ताकि वे कुछ पैसे कमा सकें।
- मध्यम और उच्च वर्ग के परिवार अपनी बेटियों को नियमित रूप से स्कूल तो भेजते हैं लेकिन कॅरियर विकल्पों पर ज़ोर नहीं देते।
- देश में लड़कियों की एक बेशुमार संख्या शिक्षित और पेशेवर रूप से सक्षम होने के बावजूद अविवाहित रह जाती है क्योंकि उनके माता-पिता विवाह पूर्व दहेज की मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं।
वर्तमान परिदृश्य में भी इस वैश्विक कोरोना महामारी में एक बहुत बड़ा मजदूर वर्ग शहरों से पलायन कर गांव लौटा है , जिससे बालिकाओं की कम आयु में विवाह की समस्या उत्पन्न हुई है।
इस समस्या का ही परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी वैश्विक लैंगिक असमानता सूचकांक में भारत 123 वें पायदान पर तथा ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2021 में 156 देशों की सूची में 140 वें स्थान पर रहा है।
हमारे देश में आज भी तमाम ऐसे सोच के व्यक्ति होंगे, परिवार यहां तक की समाज मिल जाएंगे जो बालिकाओं को कमजोर समझते हैं उन्हें अभिशाप समझते हैं, और जब कन्या इन घरों में जन्म लेती है तो लोग दुखी हो जाते हैं।
इन्हीं दूषित मानसिकता वाले लोगों को कन्याओं की ताकत व कन्याओं की अहमियत जगाने के लिए इस राष्ट्रीय कन्या दिवस मानने की जरूरत पड़ी।
आज के इस आधुनिक युग में जहां एक ओर विश्व सफलता की नई इबारत लिख रहा है तो वहीं दूसरी ओर हमारे समाज में आज भी लड़कियों को उचित सम्मान तथा अधिकार मुश्किल से ही प्राप्त हो पाते हैं।
उन पर अनेक तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं।
देश के कुछ राज्य जैसे हरियाणा ऐसे राज्य है जहां आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी समाजिक अभिशाप एक ज्वलंत समस्या है।
इस समस्या का एक प्रमुख परिणाम लिंगानुपात में असमानता से भी स्पष्ट होता है।
हालांकि लिंगानुपात की स्तिथि पहले से काफी बदली है।
लड़कियां ऊंचाइयों की ओर-
अपने मार्ग में आने वाली इन तमाम बाधाओं को दृढ़ता से हराकर बेटियां आज पुरूषों से भी आगे निकल गई है।
संसार के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी क्षमताओं को सिद्ध करने में बेटियां पूर्णतः सफल रहीं हैं।
बेटियों को लेकर समाज का नजरिया भी बदला है, इसका स्पष्ट परिणाम हमें वर्ष 2021 में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण रिपोर्ट NFHS-5 में देखने को मिलता है।
जिसमें लड़कियों की संख्या तथा जन्म दर में वृद्धि दर्ज की गई है
देश में पहली बार NFHS-5 के अनुसार महिलाओं की संख्या पुरूषों की संख्या से अधिक दर्ज की गई है। तथा लिंगानुपात 1020 महिलाओं पर 1000 पुरुष दर्ज की गई है।
बालिकाओं की शिक्षा को भी प्रोत्साहित करने हेतु केंद्र सरकार की ओर से बालिका शिक्षा प्रोत्साहन , सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाएं संचालित है। जिसका परिणाम है कि अपनी लगन तथा मेहनत से बेटियां शिक्षा ग्रहण करने में लड़को से आगे निकल गई है।
शिक्षा और स्वतंत्रता एक शक्तिशाली एवं मूल्यवान उपहार है जो माता-पिता अपनी बेटी को दे सकते हैं।
- यह बदले में उसे आर्थिक रूप से मज़बूत होने और परिवार में योगदान देने वाले एक सदस्य बनने में मदद करेगा, जिससे परिवार में सम्मान के साथ उसकी स्थिति भी सुदृढ़ होगी।
- इसलिये बेटियों को अच्छी शिक्षा प्रदान करना और उन्हें अपनी पसंद का कॅरियर बनाने के लिये प्रोत्साहित करना सबसे अच्छा दहेज है जो कोई भी माता-पिता अपनी बेटी को दे सकते हैं।
केंद्र सरकार ने बालिका विवाह की आयु 18 वर्ष निर्धारित करने हेतु बनाए गए शारदा एक्ट में संशोधन करते हुए जया जेटली समिति की अनुशंसा अनुसार लड़कियों के विवाह की आयु 21 वर्ष करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।
जिससे जल्द ही देश की अधिकांश बेटियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने सपनों को पूरा कर सकेंगी।
इस डिजिटल क्रांति के युग में बालिकाओं को साईबर क्राइम की समस्या से बचाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा साईबर क्राइम पोर्टल शुरू की गई है। जिसके माध्यम से साईबर क्राइम की शिकार या आशंका में बालिकाएं अपनी पहचान गोपनीय रखते हुए अपनी शिकायत Online दर्ज करा सकती है। जिस पर त्वरित कार्यवाही की जाती है।
निष्कर्ष -
इन विभिन्न योजनाओं के सफल क्रियान्वयन से बालिकाओं की स्थिति काफी बदली है। जिससे विश्व स्तर पर उन्हें उचित सम्मान भी प्राप्त हो रहा है।
परन्तु आज भी हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो बालिकाओं के जन्म पर खुश नहीं होता व उसे अभिशाप मानता है। बेटियों को पराई धन समझकर उसकी शिक्षा पर भी उचित ध्यान नहीं देता है।
अतः हमें इस विकृत मानसिकता को बदलने हेतु लोगो को जागरूक करने की जरूरत है। क्योंकि बेटियों से ही हमारा आने वाला कल है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं
- -तुलेश्वर कुमार की कलम से
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