दोस्तों इस लेख में हम आपको अज्ञेय जी द्वारा रचित कविता " कलगी बाजरे की" इसकी व्याख्या करने जा रहे हैं। यह कविता अज्ञेय जी की प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरे बाजरे की।

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो 
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

संदर्भ- 

        उपर्युक्त पंक्तियां प्रयोगधर्मी कवि अज्ञेय की  कलगी बाजरे की' शीर्षक कविता से अवतरित है । यह रचना कवि के ' हरी घास पर क्षणभर ' कविता संग्रह में संकलित हैं। इस कविता के माध्यम से कवि ने काव्य के क्षेत्र में सर्वथा नए प्रतीकों और उपमानो के संधान और प्रयोग पर बल दिया है।

प्रसंग - 

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी प्रेयसी की तुलना पुराने उपमानो के बदले कलगी बाजरे की या हरी बिछली घास से करता है। इससे कवि को अपना प्रेम कहीं अधिक व्यापक प्रतीत होता है।

व्याख्या - 

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी प्रेयसी की तुलना तारा, कुमुदिनी अथवा चंपे की कली जैसे पुराने उपमानों को छोड़कर चिकनी हरी घास और बाजरे की कली से करता है। उसके अनुसार हरी घास और बाजरा उसकी प्रेयसी की सुंदरता के अधिक निकट है। ये दोनों शहरी लोगों के लिए जूही के फूलों से भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकते हैं। कवि इन दोनों की सादगी भरी शोभा से इतना प्रभावित है कि वह इसके माध्यम से सारी सृष्टि को अपने निकट महसूस करता है। वह प्रेमिका को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम्हें लालिमा से भरपूर शाम को आकाश में चमकने वाली अकेली तारिका नहीं कहता अथवा शरद ऋतु के भोर की कुहरे से ढकी कुमुदिनी नहीं कहता हूं तो इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे हृदय में प्रेम की गहराई नहीं, भावना या संवेदना से शून्य हूं । 

तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम में किसी प्रकार की कोई मलीनता या दुर्भावना नहीं है बल्कि इसका कारण यह है कि सदियों से प्रचलित ये पारंपरिक उप मान  अब पुराने हो चुके हैं। बासी हो चुके हैं। देवता भी इन प्रतीकों को कूच कर चुके हैं। इनकी अंतर्निहित शक्ति फीकी पड़ चुकी है। परिवर्तित समय में इनसे अर्थ की अभिव्यक्ति कमजोर तरीके से अथवा असफल ढंग से ही हो पाती है।  ये प्रतीक और उप मान घिस चुके हैं। इनका उपयोग बार बार होने के कारण ये शक्तिहीन हो चुके हैं। जिस प्रकार बासन को अधिक घिसने से वह पुराना पड़ जाता है, उसकी चमक बेहद फीकी पड़ जाती है , बिना कलई का बर्तन निष्प्रभ हो जाता है । ठीक वैसी ही स्थिति पारंपरिक उपमानो की होती है। 

तारिका का प्रकाश, उजास और उसकी अलौकिकता , कुमुदिनी की निर्मलता, चंपे की मादकता , पुराने,जूठे  , बासी और प्रभावहीन हो गए हैं। इसके विपरित नवीन उपमानो के प्रयोग हो तो उनमें ताजगी, नवीनता और मौलिकता होगी। इसलिए प्रियोगधर्मी कवि अपनी कविताओं में नवी न उपमानों  और प्रतीकों का प्रयोग करता है। 


मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादु के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-

बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की ?

प्रसंग - 

प्रस्तुत पधांश में कवि ने अनछुए और सर्वथा नवीन उपमानो का प्रयोग किया है। पुराने और पारंपरिक उपमानों की तुलना में कवि द्वारा प्रयुक्त उप मान अधिक अथॆव्यंजक और उद्देश्य धर्मी है। हो सकता है कि ये उप मान अपनी नवीनता के कारण थोड़े अटपटे लगें, लेकिन उद्देश्य की सिद्धि में कवि को अचूक प्रतीत होते हैं।

व्याख्या - 

कवि अपनी प्रियतमा से कहता है कि क्या इन नए उपमानो  के प्रयोग से तुम्हारे रूप सौंदर्य का बखान करूं तो क्या तुम मेरी भावनाओं को नहीं समझ सकोगी ? क्या इनके प्रयोग से तुम अपने आप को समझ नहीं पाओगी ? मेरे लिए तो तुम्हारा नैसर्गिक सौंदर्य इन प्रतीकों - उपमानो के अधिक निकट जान पड़ता है । इसलिए इं नवीन और ताजे - टटके उपमानो से तुम्हें उपमित करने में मुझे कुछ अनुचित प्रतीत नहीं होता है । बड़े ही सहज भाव से अपने हृदय की अतल गहराई से तुम्हारे प्रेम से अभिभूत हो अत्यधिक जुड़ाव के साथ यह कह रहा हूं कि तुम हरी बिछली घास हो अर्थात  जिस प्रकार की फिसलन, चिकनाई और हरियाली हरी घास में होती है उसी तरह तुम्हारे रूप - लावण्य की सुगढ़ देह का इससे अच्छा उपमान नहीं हो सकता । हवा में डोलती छरहरी, मुलायम, पतली बाजरे की कलगी तुम्हारे अल्हड़पन और मस्ती का परिचायक हो जाता है। कवि का कहना है कि किस भाव बोध से ये नए उपमान रचे गए हैं , उन्हें केवल तुम ही समझ सकती हो।


आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से 
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली 
बाजरे की।

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

शब्द जादु हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है ?

व्याख्या -

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अज्ञेय ने नए उपमानो के महत्व और औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि हरी बिछली घास बिल्कुल नया उपमान है । लेकिन यह उपमान नारी की कोमलता, सहजता और ताजगी के अहसास को व्यक्त करता है। इसमें शुष्कता नहीं, अपितु एक आद्रता एक नमी है। साथ ही , सौंदर्य की व्यापकता भी। इन पंक्तियों में कवि घास और बाजरे को शहरी सभ्यता और पूरी सृष्टि से जोड़कर देखता है। शहर में रहने वालो के लिए अपने घरेलू बगीचे पर साज- संवार कर उगाए गए जूही के फूल से उस ऐश्वर्य, सच्चाई, औदार्य और सृष्टि के विस्तार का बोध नहीं हो सकता जो  हरी बीछली घास ' अथवा शरद ऋतु की संध्या बेला में आकाश की शून्यपिठिका पर लहलहाते बाजरे की कलगी में है। भाव यह है कि चिकनी घास शहर में रहने वालो के लिए इस संसार की विशालता , समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है। शहर के निवासी के अनुसार जूही के फूल घास और बाजरे की कलगी से अधिक महत्वपूर्ण है। वे इसी से दुनिया की विशालता को समझने की भूल कर बैठते हैं। जबकि हरी घास और बाजरे की कलगी लोक जीवन और लोक संस्कृति के अंग है। इनसे आम तौर पर शहरी जनजीवन दूर रहता है। कवि ने आगे की पंक्तियों में इन दोनों को सम्पूर्ण सृष्टि से जोड़ने का प्रयास किया है। कवि ने स्पष्ट कहा है कि जब - जब मैं इन्हें देखता हूं तो सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार मानों सघन हो उठता है । विशाल पृथ्वी भी सिमटी हुई प्रतीत होती है। यह इसलिए की कवि को समूचा संसार  उसके आस पास महसूस होने लगता है । ऐसी स्थिति में वह भाव विव्हल होकर सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति अपने को समर्पित कर देता है। 

यह सच है कि शब्द भावों की अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम है जो सुनने वाले पर जादू सा असर करता है  परन्तु मौन की अभिव्यंजना मुखर न होकर भी अधिक गहनता से भावों को संप्रेषित कर देती है। कवि अंतिम पंक्तियों में यह सवाल पूछता है कि क्या उसके एकांत और स्थिर समर्पण का कोई मोल नहीं है ? यह समर्पण प्रेमिका के प्रति हो सकता है तो प्रकृति अथवा सृष्टि के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। कवि की दृष्टि में शब्दों के कृत्रिम जादू से समर्पण कहीं अधिक मूल्यवान है।