अभी सुबह के 6 ही बजे थे। आसमान में हल्का हल्का धुंध छाया हुआ था। आसमान के पीछे से दिनकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था। रमेश बाबू जल्दी जल्दी बदन पर सरसो का तेल घसे, बाल्टी और लोटा लिए घर के ठीक सामने के मंदिर पास वाली नल पर पहुंच गए। वहां पहले से पड़ोस का सुंदरू दातुन कर रहा था। रमेश बाबू बाल्टी रखते हुए बोले. " तनि नलवा चलावा हो । झट से नहा लें। निकलना है।
तभी अचानक खेत की तरफ से सैर पर निकले ठाकुर जी, जो रमेश बाबू के ही स्कूल में साथी टीचर थे, की नजर रमेश जी पर पड़ी।
" एतना बिहने बिहने असनान ध्यान हो रहा है, कहां का जतरा है मास्टर साहब ? " खैनी रगड़ते हुए ठाकुर जी बोले।
व रमेश बाबू तब तक 3 लोटा पानी डाल चुके थे। गमछा से पीठ पोंछते हुए बोले, " हां आज तनी कमलेश दिल्ली जा रहा है, वहीं स्टेशन छोड़ने जाना है, 9 बजे का ही ट्रेन है। विक्रमशिला। "
अभी ई भोरे भोरे दिल्ली ? ठाकुर जी ने कौतूहल से पूछा।
रमेश बाबू ने गीली लूंगी बदलते हुए कहा " हां बी ए कर लिया।
यहीं छपरा JNS कॉलेज से कराए। अब बोला M.A. ,PhD का डिग्री जमा करके का होगा ई जुग में! सो दिल्ली जाते हैं, IAS का तैयारी करेंगे। जेतना दिन में लोग एम. ए. करेगा मन लगाके पड़ दिया तो ओतना दिन में आई एस बन जाएगा।
ठाकुर जी सहमति में सिर हिलाते हुए कहा " ऊ बात तो ठीके बोला। हां, यहां कुछ भविष्य नई है। खाली एम ए , बी.ए के पूछता है आजकल! हमारे साढू साहब भी यही किए, इहें बोकारो स्टील प्लांट में है। लड़का को बोकारो में pdhaye अब दिल्ली भेजे है। आई ए एस वाला में तैयारी करने। अरे महाराज , सोचिए न आई ए एस हो गया तो तीन पुस्त तार देगा हो रमेश बाबू !
सुनते ही रमेश बाबू की आंखो में लाल बत्ती जल गई । चेहरे पर हंसी और रोमांच का मिश्रित भाव लिए खुद को सहज करते हुए बोले, देखिए , अब इतना त नै पता लेकिन हां पधाई में ठीक है। बोला दिल्ली जाएंगे। हम बोले ठीक है, जो मन का हो सो करो। अपना भविष्य बनाओ। आज का बच्चा बहुत समझदार हो गया है ठाकुर जी। आप कोई चीज नहीं थोप सकते। हम भी बोले, जाओ आई ए एस का मन है तो करो। पैसा कउड़ी के चलते मन मत मारो और ए बात तो आप ठीक ही बोले कि बन गया तो तीन पीढ़ी का कल्याण हो जाएगा।
हां , डाक्टर बनकर आप अपना करियर बना सकते हैं। इंजीनियर बनकर आप अपना करियर बना सकते हैं पर अगर अपने साथ साथ कई पीढ़ियों का करियर बनाना है तो आई ए एस बनना होगा। यह एक सामान्य सोच थी जो हिंदी पट्टी के लगभग हर छोटे बड़े कस्बे या गावं में थी। शायद एक सफल लडके की पीठ पर तीन चार पीढ़ियों को वैतरणी पार कराने कल्पनाओं ने आई ए एस को हर पढे लिखे परिवार का सपना बना दिया था।
वहां पुरवाई बहती तो उसमें भी आई ए एस का नशा था, पछिया बहती तो उसमें भी आई ए एस का नशा । और नशा तो नशा था।
आपस में बात करते करते ठाकुर जी भी रमेश बाबू के दुवार तक आ गए।
आईए, आप जल्दी जल्दी कपड़ा लत्ता पहनिए कमलेश तैयार हो गया है। अंदर से पत्नी रमसिला देवी की आवाज आई।
रमसीला देवी गठिया के रोग से पीड़ित थी । सुबह जल्दी उठकर बेटे के लिए सभी जरूरी चीजें बनाकर झोले में रख दी थी।
देख लो एक बार सामान अच्छा से कुछ छूटा तो नहीं है? मां बोली ।
मां के बोलते ही कमलेश का ध्यान जरूरी चीजों पर गया।
" यहां मोबाइल का चार्जर रखे थे कहां है, ईयर फोन देखें है कोई? " कमलेश बोला।
मां दूसरे कमरे से सामान लेकर आई और बोली, रख लो बढ़िया से। बाहर अकेले रहोगे । अपना सामान जिधर - तिधर रखने वाला आदत छोड़ो अब । " कमलेश ने मुस्कुराकर कहा ' हां'। मां फिर बोली ' पहले टिकिट बढ़िया से रख लो ऊपर वाला जेब में। "
" हां रख लिए हैं" । कमलेश एक बड़े बैग में किताबें डालने लगा।
" किताब यहां से ढो के केतना ले जा रहे हो वहां तो खरिदबे करोगे। यहां से दिल्ली ले जाने का क्या मतलब? " रमेश बाबू अपना चश्मा पहनते हुए बोले। कमलेश एक नजर उनकी तरफ देखा और फिर किताबें ठूंसते हुए कहा, " पुराना वाला NCERT रखे हैं।वहां मुश्किल से मिलता है। खाली नया वाला ज्यादा मिलता है जबकि प्रश्न पुरनका से ही भिड़ता है। बेसिक तैयारी पुरानके से करना होता है। "
" बेटे की तैयारी को लेकर यह समझदारी और लक्ष्य के प्रति अभी से इतनी गंभीरता देख रमेश बाबू एकदम रोमांचित और उसे दिल्ली भेजने के अपने निर्णय के प्रति आश्वस्त हो रहे थे। उन्हें लगने लगा था कि अभी रह रहकर आंखो में चमक जानेवाली लाल बत्ती जल्द ही आंखो से निकल उनके दरवाजे पर खड़ी होगी।
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