आज हम इस लेख में ' सूर्यकांत त्रिपाठी निराला' जी द्वारा रचित कविता " वह तोड़ती पत्थर" पर चर्चा करने जा रहे हैं। यह कविता एक सड़क किनारे पत्थर तोड़ती श्रमिक महिला के संघर्षों से हमें परिचित कराती है।की किस प्रकार एक वर्ग है जिसे आप और हम श्रमिक वर्ग का दर्जा देते हैं। इनका जीवन किस प्रकार संघर्ष करते हुए व्यतीत होता है, इनको अपने जीवन यापन हेतु किस प्रकार के संघर्ष करने पड़ते है। इस कविता में हमको इसी स्थिति से लेखक ने परिचय कराने का प्रयास किया है।
यह कविता निराला जी के एक उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति और उनकी समस्याओं की ओर प्रकाश डालते दिखाई देती है।
कविता के अश इस प्रकार है -
वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"
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