बीते महीनों जातिगत जनगणना को लेकर गहमागहमी मची हुई है केंद्र सरकार ने कहा है कि आगामी जनगणना में जाति और समुदाय की गणना नहीं की जाएगी। तब से लेकर जाति और समुदाय पर आधारित पार्टियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।
हाल ही में बिहार सरकार ने सभी जातियों और समुदायों का SECC ( social economical caste census) कराने का ऐलान किया है।

जातिगत जनगणना :-


मौजूदा जातिगत जनगणना में केवल ओबीसी में आने वाली जातियों की गिनती की मांग रखी गई है लेकिन आजादी के बाद दशकीय  जनगणना में केवल एससी एसटी के अंतर्गत आने वाली जातियों की ही गिनती की जाती रही है जबकि बाकी अन्य जातियों को सामान्य मानकर उनकी गिनती नहीं की जाती थी।

अब मांग की जा रही है कि 2021 की जनगणना में ओबीसी जातियों की भी गिनती की जाए।
2011 के SECC के तहत की गई जातिगत जनगणना के आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं हालांकि आजादी से पूर्व 1931 में एक बार जातिगत जनगणना हो चुकी है।

SECC के तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के हर एक भारतीय परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का पता लगाया जाता है।

जातिगत जनगणना और सामान्य दशकीय जनगणना में अंतर:-


भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान वर्ष 1881   में पहली बार दशकीय जनगणना की शुरुआत हुई थी।
दशकीय जनगणना का संचालन गृह मंत्रालय के तहत महा रजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा किया जाता है।
दशकीय जनगणना भारतीय आबादी का पूरा लेखा-जोखा मुहैया कराती हैजबकि जातिगत जनगणना राज्य में मौजूद जाति और समुदाय की आबादी और समाज में उसकी हिस्सेदारी को दिखाती है।
जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाता क्योंकि इसे 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत गोपनीय माना जाता है।सरकार इसका इस्तेमाल परिवारों को लाभ पहुंचाने या प्रतिबंधित करने के लिए कर सकती है।

जातिगत जनगणना क्यों ?


जातिगत जनगणना कराने का पहला कारण है वंचितों की वास्तविक स्थिति जानने में सहायक होना।
उदाहरण के लिए अगर देखें तो ओबीसी वर्ग सामाजिक अन्याय का लंबे समय से शिकार रहा है साथ ही हमें यह भी पता है कि अगर किसी वर्ग की सामाजिक वंचना को समाप्त करने संबंधी उपायों को अपनाने में देरी की जाए तो उस वर्ग में असंतोष बढ़ने लगता है।
सामाजिक न्याय व समावेशी विकास के लिए जरूरी है कि किसी भी राष्ट्र के सफल निर्माण के लिए सभी वर्गों का कल्याण करना जरूरी है। ओबीसी वर्ग लंबे समय से कल्याण से वंचित रहा है।
संसाधनों के बंटवारे पर भी बड़े पैमाने पर असमानता मौजूद है । विभिन्न जातियों के मध्य मौजूद असमानता को दूर करने में जातिगत जनगणना से आसानी होगी।

इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ओबीसी वर्ग की सामाजिक आर्थिक व शैक्षिक स्थिति का हर 10 साल में अध्ययन कराया जाना चाहिए ताकि इस वर्ग की ऐसी जातियों को ओबीसी वर्ग से निकालकर सामान्य वर्ग में शामिल किया जा सके जो सामाजिक ,आर्थिक व शैक्षिक स्तर पर मुख्यधारा से जुड़ गई हो इससे ओबीसी वर्ग की अन्य वंचित जातियों को भी लाभ प्राप्त हो सकेगा।

इससे मराठा व जाट जो ओबीसी में शामिल करने की मांग व आंदोलन कर रहे हैं उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति को साबित करना पड़ेगा यदि वह ऐसा नहीं कर पाए तो यह मुद्दा यहीं समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार सड़क पर चल रहे आरक्षण से जुड़े बेलगाम आंदोलनों पर लगाम लगाने में भी जातिगत जनगणना कारगर साबित हो सकती है।

जातिगत जनगणना के विरोध में तर्क:-


भारत जैसे विविधता से भरे हुए विशाल देश में जातिगत जनगणना करना प्रशासनिक रूप से बहुत मुश्किल व दुरूह कार्य है।
वर्ष 2021 की जनगणना में पहले से ही बहुत देरी हो चुकी है अतः इस वर्ष जातिगत जनगणना करना मुमकिन नहीं है।

भारत में अनेक प्रकार की हजारों जनजातियां निवास करती है जिनकी कोई अधिकारिक रजिस्ट्री नहीं है इससे जनगणना में अधिक गलतियां होने की संभावना है।
यहां एक ही जाति के अनेक उपजातियां पाई जाती है जिससे जातिगत जनगणना करने में काफी कठिनाई हो सकती है।

जातिगत जनगणना जाति व्यवस्था को और प्रभावी बनाने और देश को कई टुकड़ों में विभाजित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

आगे का रास्ता :-


बेहतर कल्याण हेतु राज्य के पास जातिगत जनगणना से जुड़े सटीक आंकड़े होना अत्यंत आवश्यक है ।

केवल ओबीसी या हो सके तो उसके उपवर्ग  की गणना सरकार को करानी चाहिए।
जातिगत जनगणना को लेकर एक तर्क यह भी है कि इससे सामान्य कोटा में अफरा-तफरी मच गई सामान्य वर्ग को यह भय हो सकता है कि आरक्षण पर लगी 50% की सीमा को हटा दिया जाए इससे माहौल खराब कर सकते हैं।