ब्लैकबोर्ड के उस पार ( संस्मरण )

कुछ दिन केवल कैलेंडर में दर्ज होते हैं, और कुछ दिन जिंदगी की किताब में हमेशा के लिए लिखे जाते हैं। और ऐसा ही एक छोटा सा खूबसूरत पन्ना  मेरी ज़िन्दगी की किताब में भी हमेशा के लिए जुड़ गया । ऐसी घटनाएं  जिनकी स्मृतियाँ हमारे अवचेतन मन में हमेशा के लिए संचित हो जाती है , और यह एक खूबसूरत याद अकस्मात हमें अपने जीवन के उन अविस्मरणीय क्षणों को रह रह के याद करने पर मजबूर कर ही देता है, और फिर यह हमारा चंचल मन यादों के उस खूबसूरत सफर को पुनः जीवित कर देता है। एक ऐसी ही खूबसूरत याद है जिसकी कहानी मै कहने जा रहा हूँ।  

तो इस वृतांत की शुरुआत होती है हमारे डी.एल.एड

के द्वितीय वर्ष में जहाँ हमें 45 दिवस अध्यापन कार्य

के लिए प्राथमिक स्कूल में जाने का अवसर

मिलता है। 45 दिवस तक स्कूल में एक शिक्षक के

रूप में अध्यापन का अवसर मिलना सिर्फ

एक औपचारिकता मात्र नहीं  बल्कि एक

नई जिम्मेदारी भी थी जहाँ एक कोरे स्लेट पर

पहला अक्षर लिखना था।

वैसे तो मैंने स्कूल में बोर्ड ( 10 -12 ) के बच्चों को

पढ़ाया था तो यह एकदम नया अवसर नहीं था।

लेकिन मुझे लगता है यह उससे भी ज्यादा

चुनौतीपूर्ण था क्योंकि यहाँ सिर्फ पढ़ाना नहीं

बल्कि उनके बाल मन को समझना ,

उनकी शरारते उनकी मस्तियाँ इन सभी

से रूबरू होकर के भी उनमे अनुशासन , नैतिकता ,

ईमानदारी जैसे गुणों का विकास करना

भी एक लक्ष्य था । 

वैसे जब मैं पहली बार स्कूल गया तो मन में एक अनकही जिज्ञासा थी कि स्कूल कैसा होगा, वहां के शिक्षक कैसे होंगे , बच्चे कैसे होंगे , क्या शिक्षक एकदम सख्त होंगे ये सब। 

लेकिन जब मैं स्कूल में अपना पहला दिन बिता के वापस आया तो ये सब सिर्फ कपोल कल्पना मात्र थी उससे ज्यादा कुछ नहीं।  स्कूल के सभी शिक्षक मिलनसार और बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे। जब मै पहली बार कक्षा में गया तो 4थी कक्षा के सभी बच्चे एक साथ खड़े हो अपनी नन्ही मुस्कान के साथ मेरा स्वागत और अभिवादन किये। यह क्षण मैंने अपने अन्तर्मन से महसूस किया था और इसे सिर्फ शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुश्किल है। 

रोज सुबह 10 बजे प्रार्थना सभा के पश्चात् कक्षा संचालित होती थी। स्कूल में मुझे 4th और 5th कक्षा के अध्यापन का अवसर मिला लेकिन कक्षा में बच्चों की संख्या काफी कम होती थी , इसका कारण था कि वहां के एक शिक्षक कमजोर बच्चों की विशेष कक्षाएं लेते थे और विडंबना यह रही कि 4th और 5th कक्षा के सारे बालक उस विशेष कक्षा का हिस्सा थे। कक्षा में सभी छात्राएं पढ़ने में बहुत अच्छी थी। लेकिन मैंने देखा की प्राथमिक स्कूल के शिक्षक अभी तक अधिकांश बच्चों को अक्षर ज्ञान तक नहीं सीखा पाए थे , न ही बच्चों में कोई अनुशासन था। बिना किसी कारण या किसी से पूछे बिना बाहर निकल जाते थे और इसके लिए न ही उन्हें कोई शिक्षक रोकता या टोकता था।  अधिकांश सरकारी स्कूलों का यही हाल है। शायद इसलिए भी कोई पालक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहता। उनके मन में सरकारी स्कूल के प्रति एक नकारात्मक छवि बनी हुई है जिसे ऐसे दृश्य और दृढ़ बना देते हैं। शिक्षक केवल एक पेशा नहीं है बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है , एक शिक्षक भविष्य निर्माता होता है। इसलिए शिक्षकों से यह बिलकुल अपेक्षित है कि वे अपने दायित्वों का जिम्मेदारीपूर्वक पालन करें। क्योंकि एक शिक्षक के मार्गदर्शन में ही एक छात्र अपने सुनहरे भविष्य की नींव रखता है। 

हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश में हाल ही में शिक्षा की स्थिति में काफी गिरावट देखने को मिली है, जहाँ मुलभुत बुनियादी जरूरतों तक सिमित पहुँच के साथ - साथ योग्य और कुशल शिक्षकों की कमी भी इस समस्या का प्रमुख कारण दिखाई देती है। 

नीति आयोग द्वारा जारी स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स (School Education Quality Index - SEQI) में छत्तीसगढ़ 13वे स्थान पर है। इस रैंकिंग के अनुसार छत्तीसगढ़ में कक्षा 3, 5 और 8 के छात्रों का भाषा (Language) और गणित (Mathematics) में औसत स्कोर राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कमजोर पाया गया। और ऐसे में हमें इस AI के ग्लोबल विलेज में दुनिया के विकसित देशों से प्रतिस्पर्धा करने में हजारों साल लग जाएंगे।  क्योंकि किसी भी राष्ट्र को विकसित और सभ्य व श्रेष्ठ बनाने अर्थात एक ऐसा समाज बनाने जहाँ अपराध की कोई सम्भावना न हो , लोग नियमों का पालन करे , एक - दूसरे की मदद करें और नैतिक व ईमानदार बने , इन सभी के लिए प्राथमिक स्तर से ही बच्चों में इन गुणों के विकास के बीज अंकुरित करने का सार्थक प्रयास करना बहुत आवश्यक है।  ताकि हम आनेवाले कल के लिए बेहतर बन सके। 

स्कूल में हमने सबसे पहले बच्चों को अनुशासन में रहने के लिए प्रोत्साहित किया और धीरे धीरे लगभग सभी बच्चे अनुशासित होते गए , अब वे बिना पूछे या अकारण बाहर नहीं निकलते थे। हमने कमजोर बच्चों पर विशेष ध्यान देकर उनको अक्षर ज्ञान , संख्या ज्ञान , वर्णमाला , बारहखड़ी और पहाड़े याद करवाने का प्रयास किया।  धीरे - धीरे हमारा यह प्रयास सफल होता गया और अंततः अधिकांश बच्चे बहुत हद तक काफी कुछ सीख गए थे। ग्रामीण परिवेश में अधिकांश बच्चे अशिक्षित , निम्न व आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं जहाँ बच्चो की शिक्षा पर उनके पालक पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। बच्चों की कमजोर शैक्षणिक स्थिति का संभवतः यह भी एक कारक हो सकता है। 

अच्छी शिक्षा सिर्फ महंगे निजी स्कूलों में ही नहीं बल्कि सरकारी स्कूलों में भी मिल सकती है बशर्ते शिक्षक अपनी जिम्मेदारी बखूबी पूरा करे और पालक भी बच्चों की प्रगति और उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दे , तो ये सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किसी भी महंगे स्कूलों के बच्चों से हर क्षेत्र में आगे निकल सकते है।  

स्कूल में एक 4थी कक्षा में बच्ची थी उसका नाम रिया था।  वह सबसे आखरी में अकेले बैठती थी , बिलकुल चुप - चाप  किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी। मैंने देखा कि सब बच्चे अपनी किताबों को स्कूल बैग में पकड़ के स्कूल आते थे किन्तु रिया एक पुराने से झोला में अपने किताबों को लाती थी। उसके पास नाममात्र की 1 - 2 कॉपियां थी जिसमे वो सारे विषय को लिखती थी। वह रोज पुरे होमवर्क करके लाती थी,  और पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। मैंने समूह बना कर गेम्स , या कोई चर्चा या कहानी के माध्यम से उसको बाकि बच्चों से जोड़ने की कोशिश की और अंत तक यह एक प्रयास से सफल कोशिश बन गई।  अब वह बच्ची धीरे -धीरे बाकि बच्चों से भी सहज होती गयी। 

मैंने देखा की छोटे बच्चों को समूह में बाँट कर आपस में चर्चा करने जहाँ पूरी स्वच्छंदता हो , कोई पाबंदी न हो और उनकी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए चित्र प्रदर्शन विधि काफी उपयोगी रहा जहाँ मैंने उनको अपने स्मार्टफोन में अध्यापन के दौरान पाठ में आने वाले स्थानों को दिखाया , जिससे सभी बच्चों में पढ़ाई को लेकर जो निरसता थी वह न के बराबर दिखी। जैसे मैंने कक्षा 4th में हिंदी पाठ्यपुस्तक से जयपुर की सैर पाठ को पढ़ाते समय जयपुर शहर के विभिन्न पर्यटन स्थलों जैसे जंतर - मंतर , रामनिवास बाग़, आमेर दुर्ग , शीश महल, राजस्थान का प्रसिद्द लोक नृत्य और वहां के प्रसिद्द व्यंजन दाल बाटी चूरमा को चित्रों और विडिओ के माध्यम से दिखाया तो सभी बच्चे बहुत खुश और उत्सुकता वश उन सभी स्थानों को देखने लगे और फिर उनके बाल मन में यह छवि हमेशा के लिए अंकित हो गयी , मैंने 3-4 दिनों बाद अकस्मात भी बच्चों को इन स्थानों के बारे में पूछा तो अधिकांश बच्चे हाजिर जवाब देने में पूरी तरह सक्षम दिखाई दिए। यह सब देख मुझे बहुत प्रसन्नता हुई क्योकि मुझे लगता है एक शिक्षक की सफलता यही होती है कि उनके छात्र दुनिया के सबसे अच्छे छात्र बने जो बाकि अन्य छात्रों से हर क्षेत्र में बेहतर हो।

समय अपनी गति से चलता रहा और 45 दिन का यह अध्यापन कार्य कैसे गुजर गया यह आभास ही नहीं हुआ, इन 45 दिनों में मैंने काफी कुछ सीखा , बच्चों के साथ बिताए वो खूबसूरत पल हमेशा यादगार रहेगा जिन्हें मैंने काफी नजदीक से महसूस किया था। 

स्कूल का अंतिम दिन काफी भावुक करने वाला था। स्कूल के सभी शिक्षकों ने हमारे अध्यापन कार्य की बहुत प्रशंसा की और  हमें स्कूल में मिलने आते रहने की बात कही।  शिक्षकों से ज्यादा भावुक बच्चे दिखाई दे रहे थे , वे हमें बार - बार न जाने का आग्रह कर रहे थे। उनके बाल मन में अपने लिए इतना स्नेह और सम्मान देख मन अत्यंत द्रवित और करुणा से भर आया। जिसे इस छोटे से लेख में शब्दों के माध्यम से साझा कर पाना बहुत मुश्किल है।  यह एक ऐसा अविस्मरणीय क्षण था जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है शब्दों में प्रस्तुत नहीं।  

इस तरह हमारे अध्यापन कार्य के खूबसूरत सफर का एक यादगार समय पूरा हो गया।  

इन अनगिनत यादों को हमेशा के लिए संजों कर और बहुत सारी खूबसूरत स्मृतिओं को अपने कैमरे में कैद करने के बाद  हमारे इस खूबसूरत सफर का अंत होता है। 


 
  लेखक - तुलेश्वर कुमार यादव 

प्रशिक्षार्थी - D.el.ed ( II )

संस्था - शास. BTI डोंगरगांव





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